रोज़ अपनी रीडर शिप के आंकड़े छापने वाले अखबारों को अपने आत्म-चिंतन का वक्त आ गया है कि उनके छापे खाने से छप के बाहर निकलने वाली खबर में कितनी सचाई है. अखबारों के मालिकों/सम्पादकों ने यदि इस बात के चिंतन के लिए समय न निकाला तो वो दिन दिन दूर नहीं जब कि चौथा-स्तंभ भी संदेह के घेरे में आ जावेगा.और न्यूज़-चैनल्स की तरह अखबारों के लिये भी कहा पूछा जा सकता है:-"चैनलों के रावण को कौन जलाएगा?"
नेट-न्यूज़ पर आपका स्वागत है. मेरे निष्पक्ष प्रयास को शायद आपका दुलार मिलेगा.पीत पत्रकारिता करने वाले अखबारों के खिलाफ़ मुंह खोलने की हिम्मत कर रहा हूं
Tuesday, October 26, 2010
बेलगाम होते युवा पत्रकार
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